अकाल ( Famine)
वर्षाऋतु बीत जाती है, बादल गरज कर चले जाते हैं।
बरसता नहिं बरसात, अनाज ऊग न पाते हैं॥१॥
दरारें पड़ जातीं खेतों में, धरती प्यासी हो जाती है।
निराश कृषक हो जाते, उदासी सी छा जाती है॥२॥
अकाल ग्रस्त प्राँत हो जाते, सूखे खेत रह जाते हैं।
नई-नाले ताल-तलैयों में , केवल रेत रह जाते हैं॥३॥
कुँवे बावलियों के जल, तल नीचे चले जाते हैं।
पानी निकालते लोगों के, दम निकले जाते हैं॥४॥