सहजता की जननी- धरती माता
आवो भाई आज तुम्हें, सहजता की बात बतायें।
सहजता की जननी धरती माँ, धरती माँ के ही गुण गायें॥१॥
धरा ही आधार हमारा, धरातल पर ही हम बसते हैं।
अधर धरातल से होकर, जी नहीं हम सकते हैं॥२॥
पर महत्वाकाँक्षी मानव आज, अंतरिक्ष में पाँव उठाता है।
नाम प्रतिष्ठा के वास्ते, जीवन पर दाँव लगता है॥३॥
ज्ञान-विज्ञान वही जो, मानव को मोक्ष का मार्ग दिखाता है।
पर अहंकार उसका उसको, इधर-उधर भटकाता है॥४॥
मानव कितना दिशाहीन, उसको, सहज का मार्ग सूझ न पाता है।
इसीलिये जल थल नभ में, बारंबार भटकता जाता है॥५॥
खोद कर धरातल लोग, आज खदानों में जाते हैं।
हिमालय की चोटी पर चढ़ने वाले, वापस मैदानों में आते हैं॥६॥
सागर के अंतराल में गोताखोर, कुछ अमूल्य खोजने जाते हैं।
जीवन की खुशहाली खोजने,जीवन पर दाँव लगते हैं॥७॥
यद्यपि माप ली दूरी दुनियाँ की,सागर की गहराइयों में पैठा है।
अंतरिक्ष में उड़ कर अब, चाँद पर भी जा बैठा है॥८॥
फिर भी समझ न पाया खुद को, कितना बडा़ अज्ञान है?
सहज-दृष्टि बिन मानव प्राणी,बना हुआ नादान है॥९॥
धरती-माँ की गोद में जन्म लिया, शकुन धरती पर ही पाते है।
अंतरिक्ष में उड़ने वाले इसीलिये, वापस धरा पर आते हैं॥१०॥
धरा ही स्वर्ग है, धरा ही स्वर्ग का द्वार है।
मानव , महामानव की जननी, धरा ही सबका आधार है॥११॥
इसीलिये धरती पर, परमत्मा का राज्य अब लाना है।
सुख-शाँति, सुरक्षा समृद्धि से, परिपूर्ण इसे बनाना है॥१२॥
आत्मसाक्षात्कार से केवल, सब सहज में हो जायेगा।
विश्व-निर्मला-धर्म जब धरा पर होगा, तब स्वतः स्वर्ग उतर आयेगा॥१२॥
1 comment:
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