Tuesday, February 26, 2008

सहजता की जननी-धरती माता

सहजता की जननी- धरती माता

आवो भाई आज तुम्हें, सहजता की बात बतायें।

सहजता की जननी धरती माँ, धरती माँ के ही गुण गायें॥१॥


धरा ही आधार हमारा, धरातल पर ही हम बसते हैं।

अधर धरातल से होकर, जी नहीं हम सकते हैं॥२॥


पर महत्वाकाँक्षी मानव आज, अंतरिक्ष में पाँव उठाता है।

नाम प्रतिष्ठा के वास्ते, जीवन पर दाँव लगता है॥३॥


ज्ञान-विज्ञान वही जो, मानव को मोक्ष का मार्ग दिखाता है।

पर अहंकार उसका उसको, इधर-उधर भटकाता है॥४॥


मानव कितना दिशाहीन, उसको, सहज का मार्ग सूझ न पाता है।

इसीलिये जल थल नभ में, बारंबार भटकता जाता है॥५॥


खोद कर धरातल लोग, आज खदानों में जाते हैं।

हिमालय की चोटी पर चढ़ने वाले, वापस मैदानों में आते हैं॥६॥


सागर के अंतराल में गोताखोर, कुछ अमूल्य खोजने जाते हैं।

जीवन की खुशहाली खोजने,जीवन पर दाँव लगते हैं॥७॥


यद्यपि माप ली दूरी दुनियाँ की,सागर की गहराइयों में पैठा है।

अंतरिक्ष में उड़ कर अब, चाँद पर भी जा बैठा है॥८॥


फिर भी समझ न पाया खुद को, कितना बडा़ अज्ञान है?

सहज-दृष्टि बिन मानव प्राणी,बना हुआ नादान है॥९॥


धरती-माँ की गोद में जन्म लिया, शकुन धरती पर ही पाते है।

अंतरिक्ष में उड़ने वाले इसीलिये, वापस धरा पर आते हैं॥१०॥


धरा ही स्वर्ग है, धरा ही स्वर्ग का द्वार है।

मानव , महामानव की जननी, धरा ही सबका आधार है॥११॥


इसीलिये धरती पर, परमत्मा का राज्य अब लाना है।

सुख-शाँति, सुरक्षा समृद्धि से, परिपूर्ण इसे बनाना है॥१२॥


आत्मसाक्षात्कार से केवल, सब सहज में हो जायेगा।

विश्व-निर्मला-धर्म जब धरा पर होगा, तब स्वतः स्वर्ग उतर आयेगा॥१२॥

Thursday, January 17, 2008

मूर्त में अमूर्त



साक्षीभाव ( State of detached witness)
आनेवाला आता है, जाने वाला जाता है।
विन विचलित देख रहा तू, विचार न कोई लाता है॥१॥

चट्टान जैसा शाँत, सागर जैसी गहराई है।
न कोई भाव न प्रभाव, अत्मभाव की परछाँई है॥२॥

यह संसार निरंतर चलता ही रहता है।
घटनायें घटती रहती हैं, जीवन बहता रहता है॥३॥

तटस्थ बना तू इसमें, लिप्त नहीं होता है।
अटल अचल बना तू, संतुलन नहीं खोता है॥४॥

क्योंकि अंत में, शाँत सबको होना है।
आदि होती है तब, अंत सबका होना है॥५॥

परमात्मा के राज्य में, अमरता का वरदान है।
साक्षी-भाव बना तू, करता अमृत का पान है॥६॥

मूर्त में अमूर्त

मूर्त में अमूर्त


परमात्मा तो खुद निष्पक्ष, साक्षी बन कर बैठा है।
शायद इसीलिये मूर्ति उसकी, मंदिरों में जा पैंठा है॥१॥


पर कुछ ही लोग, इस बात को समझ पाते हैं।
कुछ इसको अंधविश्वास कहते, कुछ दकिनूसीपन बताते हैं॥२॥


फिर भी आत्मसाक्षत्कार बिन,बात समझ नहिं आयेगी।
आपस में लड़ते रहेंगे लोग, जीवन में शाँति नहिं आयेगी॥३॥


माँ ने तो बता दिया है कि, केवल साक्षी बन जाना है।
किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न करना, पर्वतवत् बन जाना है॥४॥


कोई व्यक्ति छेड़-छाड़ करता, और पत्थर को पीटता है।
पीडा़ नहि होती पत्थर को, पर चोट व्यक्ति को होता है॥५॥

Tuesday, January 15, 2008

युग-परिवर्तन

युग-परिवर्तन

श्री माता जी निर्मला देवी ने हमको, सहज में आत्मसाक्षात्कार दिया।
सहजयोग सा महायोग दिया, हमको, महामानव का आकार दिया॥१॥

युग बदल दिया श्री माता जी ने, आधुनिक युग में कृतयुग आया।
कलियुग चला गया, आज अब सतयुग आया ॥२॥

विश्व-निर्मला-धर्म को, आब हम अपनाये हैं।
सब कुछ त्याग कर, माँ निर्मला की शरण में आये हैं॥३॥

अनेकों इंसान सहजयोगी बने, देश-काल की सीमाओं को टोडा़।
विनाश की ओर उन्मुख मानवता को, अमरता की ओर मोडा़॥४॥

चाहे कोई कुछ भी कहे, सत्य को हमने अब जान लिया है।
झूठे कारनामों को देख, झूठे व्यक्तित्वों को पहिचान लिया है॥५॥

अब तो केवल एक ही विचार है, सहजयोगी सबको बनना है।
सबका कल्याण हो इसीलिये उनको, माँ निर्मला की शरण में लाना है॥६॥

जीते जी कार्य सहज का, हम सब करते ही रहेंगे।
मरणोंपरान्त पुनर्जन्म लेंगे, हर बार आत्मसाक्षातकार देते रहेंगे॥७॥

यह सिलसिला तब तक, चलता ही रहेगा।
हर इंसान जब तक, आत्मसाक्षात्कार पा न लेगा॥८॥

तब पूर्णत: इस जग में, साम्राज्य प्रभु का आ जायेगा।
सतयुग के आनंद का, वर्णन किया नहि जायेगा॥९॥




Sahajanubhooti

सहजानुभूतियाँ

मैं कौन हूँ? आया कहाँ से, कौन है मेरे अस्तित्व का आधार।
इस प्रश्न का उत्तर देने, धरती पर आये अनेक अवतार॥ १॥

पर किसी को नहीं समझा पाये वे, अर्थ उनके जीवन का।
क्योंकि समय नहीं आया था, उनके पुनर्जीवन का॥२॥

जब से सहजयोग आया तब से, हुआ सबको यह आभास।
इंसान के भीतर ही विद्यमान, है परमात्मा का प्रकास॥३॥

यही है सबके जीवन का आधार।
यही है निर्गुण निराकार॥४॥

आत्मा ही है परमात्मा की परछाँई।
श्री निर्मला माता जी ने सबको, सहज में दिखाई॥५॥

मैं कौन हूँ का उत्तर, मिल गया सहज में।
सब अस्तित्वों का अस्तित्व, मिल गया सहज में॥६॥