परमात्मा तो खुद निष्पक्ष, साक्षी बन कर बैठा है।
शायद इसीलिये मूर्ति उसकी, मंदिरों में जा पैंठा है॥१॥
पर कुछ ही लोग, इस बात को समझ पाते हैं।
कुछ इसको अंधविश्वास कहते, कुछ दकिनूसीपन बताते हैं॥२॥
फिर भी आत्मसाक्षत्कार बिन,बात समझ नहिं आयेगी।
आपस में लड़ते रहेंगे लोग, जीवन में शाँति नहिं आयेगी॥३॥
माँ ने तो बता दिया है कि, केवल साक्षी बन जाना है।
किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न करना, पर्वतवत् बन जाना है॥४॥
कोई व्यक्ति छेड़-छाड़ करता, और पत्थर को पीटता है।
पीडा़ नहि होती पत्थर को, पर चोट व्यक्ति को होता है॥५॥

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