साक्षीभाव ( State of detached witness)
आनेवाला आता है, जाने वाला जाता है।
विन विचलित देख रहा तू, विचार न कोई लाता है॥१॥
चट्टान जैसा शाँत, सागर जैसी गहराई है।
न कोई भाव न प्रभाव, अत्मभाव की परछाँई है॥२॥
यह संसार निरंतर चलता ही रहता है।
घटनायें घटती रहती हैं, जीवन बहता रहता है॥३॥
तटस्थ बना तू इसमें, लिप्त नहीं होता है।
अटल अचल बना तू, संतुलन नहीं खोता है॥४॥
क्योंकि अंत में, शाँत सबको होना है।
आदि होती है तब, अंत सबका होना है॥५॥
परमात्मा के राज्य में, अमरता का वरदान है।
साक्षी-भाव बना तू, करता अमृत का पान है॥६॥
